आँख खोली और नींद से जागे,
देखा तो घोर अंधियारा था आगे,
बस तारों की फीकी सी झिलमिलाहट थी,
आसपास न किसी रूह की आहट थी,
चाँद, चाँदनी लिए आसमान छोड़ जा रहा था,
और बढ़ता अंधेरा दृष्टि की सीमा घटा रहा था|
जहाँ खड़े थे वहाँ से जाना बड़ा दूर था,
न दिया, न मशाल, न किसी का नूर था,
अभी तो आगे भी नही किया था अपना पैर,
और रुकावटों के ख़याल़ ने कर दिए हौसले गैर,
साहस को कैसे भी अब जुटाना था,
आश्रय अब राह के फल पे ही पाना था|
कसी अपनी कमर, और बढ़ाए अपने कदम,
ऐसा लगा जैसे हो गयी हों बाधाएँ कम,
कुछ दूर बाद रवि आया बाटने हाथ,
अब तो जैसे पूरे जाग का था साथ,
रास्ते के हर पत्थर को, काटे को, दरकिनार होना था,
अब पता था मंज़िल को अपना हर हाल में होना था|