सूरज को तेज़ पे पकड़ बनाए तोड़ा ही वक़्त हुआ था, अभी पसीने की पहली बूँद ने चलना शुरू किया ही था की थकान ने अपनी
मौजूदगी का अहसास दिलाना
शुरू कर दिया था| अभी दिन का पहला पहेर पूरा भी नही हुआ था की उमंग ने औज़ारों को आराम देने का फ़ैसला ले लिया था| उस पश्चिम मुखी प्लॉट के बीचो बीच गाजर घास के जंगल में एक चट्टान थी, वह उस पर जाके विराजमान हो गया, हेमंत ऋतु ने अपनी मौजूदगी का एहसास करा दिया था जिसके चलते चट्टान तप नही रही थी| उमंग अपनी मेहनत और कुछ लोगों की सहयता से एक घर खड़ा करना चाहता था, नक्शा नगर निगम से पास भी हो गया था, काम भी कह लीजिए शुरू हो ही गया था| उमंग ने चट्टान पर बैठने के बाद तोड़ा पानी पिया और फिर इधर उधर तकने लग गया, शायद सोच रहा था की मस्तिष्क थोड़ा ठंडा होने पर काम फिर शुरू करेगा, शायद| विश्राम करते हुए समय अभी बहुत तो नही हुआ था पर आराम के लिए ज़रूरत से थोड़ा अधिक ही था| इस दौरान धूप और परवान चढ़ चुकी थी, जितना की उस मौसम में वो चढ़ सकती थी| आस पास पेड़ों की ग़ैरहाज़री ने मस्तिष्क ठंडा होने की क्रिया को धीमा कर दिया होगा पर ना जाने क्यूँ वो वहाँ धूप में अकेले उस काली चट्टान पे बैठे-बैठे राह पर बस इधर-उधर ताक रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे किसी को ढूँढ रहा हो, किसे या क्या इस बात का ज्ञात अभी किसी को हुआ नही था, शायद स्वयं उसे भी नही|
उमंग ने काफ़ी देर प्लॉट के सामने के रास्ते से जाते राहगीरों को ताकने के बाद अब अपना ध्यान वहाँ से हटा के उसके पीछे के एक छोटे से खेत और अथाह फैले मैदान पे जमा ली, नज़ारा दोपहर की धूप के बावजूद सुंदर दिख रहा था परन्तु ऐसा भी नही था की उसे देख के कोई इंसान मंत्र-मुग्ध होके बैठ जाए| खेतों में चावल की फसल काटी जा रही थी उन्हे देख आने वाली खुशी महसूस हो रही थी, मैदान पूरा घास से ढाका हुआ था जिसे गाये बकरियाँ चर रही थी, कुछ बच्चे अपना खेल खेलने में मस्त थे और आज की खुशी का एहसास दिला रहे थे, पतझड़ के कुछ पत्ते अभी भी बिखरे पड़े थे जैसे बीते दिनों की याद दिला रहे हों| मैदान के पीछे पहाड़ और उनके बीच से दिखते नीले आकाश ने उस दृश्य का अलंकरण कर उसे एक चित्र सा बना दिया था, शायद इस चित्रकला को निहारने के लिए उमंग जैसी छोटी-छोटी चीज़ों को सरहाने वाली नज़रों की ज़रूरत थी, पर उसमें मंत्र मुग्ध हो के बैठ जाने वाली बात शायद उसकी नज़रें भी ना ढूँढ पाई होंगी| परंतु वो उस दृश्य को निहारे जा रहा था, क्यूँ यह तो वो खुद या परवरदिगार ही जनता है| जब वह पहाड़ों और खेतों निहार रहा था तब उसके पीछे राह से बेला(3rd) और प्रेरणा गुज़री, उससे मिलना था शायद, उदेश्य जो भी रहा हो मगर उस अंतराल में दो-तीन बार गुज़री थीं| वो उमंग को यूँ खाली बैठे एक सामान्य से दृश्या को निहारते देख हैरान थी, प्रेरणा ने एक दो बार आवाज़ लगाने पर विचार भी किया, पर बेला ने "उसे ज़रूरत है, वो पुकारेगा" कह के उसे रोक दिया|
काफ़ी देर तक नज़ारों को निहारने के बाद भूख ने बिगुल बजाना शुरू कर दिया, सूरज अब ढालने की दिशा में बढ़ने लग गया था| उमंग ने सुरक्षित एक कोने में रखे अपने उस दिन के भोजन को देखा और उसकी तरफ चल पड़ा| भोजन जो भी था या तो बड़ा स्वादिष्ट रहा होगा या फिर बिगुल बहुत ज़ोरों से बजा होगा, क्योंकि उसने खाना चंद मिनटों में ख़तम कर दिया| भोजन ख़तम करके उसने हाथ मूह धोया और और आके कोने में बैठ गया| आस पास के मकानों के चलते और सूरज के थोड़े नीचे की और आ जाने के वजह से एक इंसान के लायक छाया आ चुकी थी, जो शायद सुबह औज़ार रखने के वक़्त भी रही होगी पर उसने उस समय छाया की ज़रूरत ना समझी होगी| कहते है खाने के बाद कोई शारीरिक श्रम नही करना चाहिए शायद इसी नियम का पालन करने हेतु उमंग छाया में जाके बैठ गया| ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी तलाश पूरी हो गयी थी, पूरे दिन उसकी आँखों में एक जुस्तजू थी, वो अब नदारद हो गया थी| परंतु दिन की कोई भी घटना तलाश के भाव के लुप्त होने के लिए ज़िमेदार नही ठहराई जा सकती थी, अब ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे अब वह हार मान तलाश छोड़ चुका था| इस बार बैठ के वो इधर उधर ताकने की बजाए अपने औज़ारों और उसके नीचे दबे हुए मकान के नक्शे को घूरने लग गया| शायद सोच रहा था की आज उसे आ कर बस इतना ही देखना था की उसका पहला प्रयास सफल हुआ था की नही| उसने पिछले कुछ दिनों में गड्ढे खोद लिए थे, और उनके बाद के कुछ दिनों में सरियों को मोड़ कर आपस में बाँध दिया था, उन्हे खड़ा कर थोड़े मेहनत और समय में उनमें सिमेंट डाल दिया था, अगले 1-2 दिन पानी भी दिया था| आज देखना था की सरियों को आपस में सही से बाँधा था की नही, सिमेंट का घोल अच्छे से बना था या नही, पानी देने में कहीं कमी तो नही रह गयी थी, और कहीं कालम टेडा तो नही बना था| बस इतना ही तो करना था उसे| इस दौरान बेला फिर गुज़री, उसने बेला को देखा, एक बार पुकारने का सोचा भी फिर रह गया| ऐसा लगा जैसे बेला उसकी मंज़िल नही पर मंज़िल का ज़रिया थी, ना जाने क्यूँ वो कुछ कहते कहते रुक गया और फिर अपने ख़यालों में खो गया|
छाओं अब धीरे धीरे बड़ी हो गयी थी, सूरज में ढालने के आसार दिखना शुरू हो गये थे| आज सूरज का चित्त जाते-जाते लोगों को एक नज़ारा दिखाने का लग रहा था| खुद नारंगी रंग ले आकाश को हल्का सा नारंगी रंग चढ़ा वो अपनी श्याम की मधाम किरणें फैला रहा था| उसने कुछ पक्षियों को भी उड़ते वक़्त उसके सामने से गुज़रने के लिए माना लिया था शायद| हवा भी शायद उसके कहने पे धीमी बह रही थी, सब कुछ मंद हो गया था| देखने वाले को दृश्या से शांति की भावना का ग्रहण(2nd) होता| शायद इसलिए उमंग कोना छोड़ के फिर आके चट्टान पे विराजमान हो गया और शाम के ढलते सूर्य को निहारने लग गया| थोड़ी देर के बाद बेला और प्रेरणा प्लॉट के सामने से फिर गुज़र रही थी, इस बार फिर उसकी नज़र बेला पर पड़ी, इस बार उसने नज़र पड़ते ही उसे आवाज़ लगाई| बेला आवाज़ सुनते ही रुक गयी, और तभी उसकी नज़र प्रेरणा पे पढ़ी, अब उमंग के चेहरे पे उत्साह दिखना शुरू हो गया था, ऐसा मालूम हो रहा था की उसकी तलाश पूरी हो गयी हो| उसके शरीर में जान आ गयी थी, जिस सुस्ती ने उसे सुबह की पहली किरण से अपनी आगोश में ले रखा था वो गायब हो चुकी थी, आँखों में खोखलेपन की जगह चमक आ गयी थी, उस एक क्षण में उसकी काया में प्राण आ गये थे, और प्रेरणा के बदते कदमों के साथ उसकी खुशी भी बढ़ती जा रही थी. वो दोनो उमंग की तरफ आई और करीब पहुँच के प्रेरणा ने पूछा "मकान का काम कैसा चल रहा है?" उत्तर में उमंग ने कहा
"एक नक्शा उधर कोने में तैयार पढ़ा है,
नीव डालने की जद्दोजहद कर चुके हैं,
डर है की कहीं सुख के तड़क ना गयी हो,
आशा है मज़बूत हो गयी होगी,
एक बाग बनाने की सोचता रहता हूँ,
उसके लिए जगह निकलना याद नही रहता,
मूरूम डलवाने की बात करने की सोच ली है,
ईट की दीवारों के सपने देख रखे है,
रंगों पर अभी गौर नही किया|"
उस पर प्रेरणा ने कहा "आओ देखते है की नीव के क्या हाल है"| उमंग ने यह सुना और उठ के प्रेरणा के साथ चल दिया नीव का परीक्षण करने| प्रेरणा ने चलते चलते कहा "मूरूम हम डलवा देंगे, दीवारों को भी पक्का कर लेंगे, और सबसे सुंदर रंग भी चुन लेंगे"| बेला आपने रास्ते जा चुकी थी, शायद किसी और उमंग की प्रेरणा ढूँढने|
"एक नक्शा उधर कोने में तैयार पढ़ा है,
नीव डालने की जद्दोजहद कर चुके हैं,
डर है की कहीं सुख के तड़क ना गयी हो,
आशा है मज़बूत हो गयी होगी,
एक बाग बनाने की सोचता रहता हूँ,
उसके लिए जगह निकलना याद नही रहता,
मूरूम डलवाने की बात करने की सोच ली है,
ईट की दीवारों के सपने देख रखे है,
रंगों पर अभी गौर नही किया|"
उस पर प्रेरणा ने कहा "आओ देखते है की नीव के क्या हाल है"| उमंग ने यह सुना और उठ के प्रेरणा के साथ चल दिया नीव का परीक्षण करने| प्रेरणा ने चलते चलते कहा "मूरूम हम डलवा देंगे, दीवारों को भी पक्का कर लेंगे, और सबसे सुंदर रंग भी चुन लेंगे"| बेला आपने रास्ते जा चुकी थी, शायद किसी और उमंग की प्रेरणा ढूँढने|