दहकते अंगरों का क्या है, गुज़रते वक़्त के साथ बुझ जाएँगे;
उठती लहरों का क्या है, साहिल पर आके टूट जाएँगी;
संग मिट्टी के तराशे पुतले हैं तो हम है;
वरना बहती हवाओं का क्या है, अंत में यह भी रुक जाएँगी;
और चोटियों पे गड़े झंडों को संकुचित कर जाएँगी|
नोट:- शीर्षिर्क गुमराह कर सकता है, आपके पास बेहतर शीर्षिर्क या और कोई सुझाव हो तो कृपया इत्तिला दे दीजिएगा| शुक्रिया|
उठती लहरों का क्या है, साहिल पर आके टूट जाएँगी;
संग मिट्टी के तराशे पुतले हैं तो हम है;
वरना बहती हवाओं का क्या है, अंत में यह भी रुक जाएँगी;
और चोटियों पे गड़े झंडों को संकुचित कर जाएँगी|
नोट:- शीर्षिर्क गुमराह कर सकता है, आपके पास बेहतर शीर्षिर्क या और कोई सुझाव हो तो कृपया इत्तिला दे दीजिएगा| शुक्रिया|