Friday, November 8, 2019

लगता नहीं है दिल मेरा - बहादुर शाह ज़फ़र

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में।

बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला,
किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार में।

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में।

एक शाख गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमान,
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में।

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में।

दिन ज़िन्दगी खत्म हुए शाम हो गई,
फैला के पांव सोएंगे कुंज-ए-मज़ार में।

कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

Wednesday, February 19, 2014

रंज

यूँ हुए उसके तुकड़े हज़ार
कि भीग गयी नम अाँखे
कि थर्राए गये कांपते होंठ
कि तप गयी गरम साँसें

अटका कुछ एसे वो धडक़ता दिल
कि मौन हो पड़ा धीमा स्वर
कि रुक गयी सुस्त नब्ज़
अौर थम गए सरकते पल

Thursday, November 28, 2013

The Silent Streets

Here dwells the silence,
in these hushed streets,
no tales to tell this eve,
among the dead leaves.

no soul around, none at all,
only old edifice, standing tall,
only trees sigh this night,
darkness the extant plight.

intermittently lights yell,
trying for little act of life,
much wasn't there to tell,
slowly, it too faded in night.

Tuesday, November 5, 2013

दशांतर

मुद्दतअों पहेले छोड़ देता दियों को, जुगनुओं की खातिर,
बलखाती लौ की मदहोशी थी, जो कोशिश करके हारा था |

यूँ तो पहले भी था रजनीकांत से व्यवहार अौर परिचय,
अब अरन में वह बना मेरा यार, मेरा सहारा था |

प्रतिवेश मैं चमक अौर नूर कि लत थी चक्षुअों को,
अब घनघोर तमस का फैला घेरा मुझे गवारा था ।

चक्रव्यूह से अाज़ादी का रास्ता नीलपंक में गढ़ा था,
मैं मूर्ख दिली अागोश के इंतज़ार मैं अरसे से खड़ा था।

छूट गया था जो पीछे, वो गाँव का उजियारा था,
वन जो विद्यमान था मेरे आगे, बसा वहाँ अंधियारा था|

नोट: अंधेरे को अच्झाई का प्रतीक अौर रोशनी को बुराई का चिन्ह दिखाने कि एक कोशिश। अौर एक तीर से दो शिकार का प्रयत्न।

Tuesday, October 15, 2013

तेरी जूस्तजू

तेरी आँखों की है जो जूस्तजू, उसे मैं पहचान ना सका,
देख उन्हे हुआ बेकाबू, और होश संभाल ना सका,

उज्वल पन्ने पे स्याह स्याही से लिखी है जो पहेली,
उसे चकोर जैसे ताकता रहा, पर कभी बुझा ना सका,

वाकिफ़ है श्याम पट जड़ित संगेमरमर की दीवारें,
भीतर की उलझनों में से दिल का रास्ता पा ना सका,

गुमान था तेरी फेहरिस्त-ए-तमन्नाओं में नहीं था शामिल,
शायद यादों में रह जाऊँगा, नसीब में तो ना आ सका|

Monday, June 10, 2013

सुबह नयनों से पलकें जब हटी,
तो उनमें बसा अक्स तुम्हारा था|

छवि तो बस एक प्रतिबिंब थी,
माखूज़ तो अस्तित्व तुम्हारा था|

हल्की सी मुस्कान थी अद्रों पर दिन भर,
ज़हन में तस्सवूर जो तुम्हारा था|

यूँ ही चलते-चलते कैसे ना सुध-बुध खोता,
मान में उठा प्रसंग जो तुम्हारा था|

फिर छटे पहर शैय्या में निहित होते,
देखा एक सपना मैंने, आदतन तुम्हारा था|

Sunday, June 9, 2013

उन्मुक्ति

बहते पलों के दामन में, अगर उलफत की यादें होती,
तो शायद अल्प विराम लगा, फिर दोबारा सोच लेते,

सोहबत के लिए, परछाई के, जो ना होते मोहताज,
तो शायद हम नील को, कंठ में रोकने का ठान लेते।

अगर सिर्फ़ करनी है बातें, व्यापक नीरवता के संग,
तो वो हम आसमान में, विद्यमान तारों से कर लेंगे,

अब नज़र के लिए जब, ना बचे हैं कोई नज़ारे,
तो अब चुपके से हम, यूँ ही पलकों को मूंद लेंगे|