आरज़ू थी दिल में, फ़तेह करने की चोटियाँ हज़ार,
लाख कोशिशों बाद, छोड़ ना पाए ये सराय क्यूँ?
इरादा बुलंद कर दर को खोला बार-बार,
फिर भी यह काफ़िर कदम उठ ना पाए क्यूँ?
फज्र दहलीज़ फाँद कर रहगुज़र तक आ भी गये एक बार,
अब रात के अंधेरे में किधर जाएँ समझ ना आए क्यूँ?
ना करी थी हमने उससे दुआएँ, ना हुए हम कभी शुक्र-गुज़ार,
सज़ा में चाहे तो बुझा दे, ज़रा ज़रा कर तड़पाये क्यूँ?
लाख कोशिशों बाद, छोड़ ना पाए ये सराय क्यूँ?
इरादा बुलंद कर दर को खोला बार-बार,
फिर भी यह काफ़िर कदम उठ ना पाए क्यूँ?
फज्र दहलीज़ फाँद कर रहगुज़र तक आ भी गये एक बार,
अब रात के अंधेरे में किधर जाएँ समझ ना आए क्यूँ?
ना करी थी हमने उससे दुआएँ, ना हुए हम कभी शुक्र-गुज़ार,
सज़ा में चाहे तो बुझा दे, ज़रा ज़रा कर तड़पाये क्यूँ?