Friday, August 19, 2011

अगति

आज एक बार और पूरब से सूरज उगा था,
एक और बार आज पश्चिम में वो डूब गया.

कुछ पौधे इस दौरान थोड़े उँचे, थोड़े सक्षम हो गये,
कुछ पेड़ों में उस अंतराल जीवनदायी फल लग गये,
कुछ पत्ते इस बीच छाया देने के लिए चौड़े हो गये,
और कुछ कलियाँ इस दरमियाँ खिल के फूल हो गयी.

कहीं किसी ने इस दौरान प्यार का इज़हार कर दिया,
उस अंतराल किसी ने इकरार और किसी ने इनकार कर दिया,
कहीं किसी ने इस बीच कुछ नया खोज निकाला,
तो कहीं किसी ने इस दरमियाँ एक नया अविष्कार कर दिया.

हम बैठे थे इस दौरान एक बाग में खाट लगा कर,
ताका अंतहीन चीज़ों को उस अंतराल में आराम फरमा कर,
कुछ लोगों का इस बीच पक्ष पुराना कल नही आया,
हमारा तो इस दरमियाँ बरसों पुराना अगला पल नही आया.