Monday, June 10, 2013

सुबह नयनों से पलकें जब हटी,
तो उनमें बसा अक्स तुम्हारा था|

छवि तो बस एक प्रतिबिंब थी,
माखूज़ तो अस्तित्व तुम्हारा था|

हल्की सी मुस्कान थी अद्रों पर दिन भर,
ज़हन में तस्सवूर जो तुम्हारा था|

यूँ ही चलते-चलते कैसे ना सुध-बुध खोता,
मान में उठा प्रसंग जो तुम्हारा था|

फिर छटे पहर शैय्या में निहित होते,
देखा एक सपना मैंने, आदतन तुम्हारा था|

Sunday, June 9, 2013

उन्मुक्ति

बहते पलों के दामन में, अगर उलफत की यादें होती,
तो शायद अल्प विराम लगा, फिर दोबारा सोच लेते,

सोहबत के लिए, परछाई के, जो ना होते मोहताज,
तो शायद हम नील को, कंठ में रोकने का ठान लेते।

अगर सिर्फ़ करनी है बातें, व्यापक नीरवता के संग,
तो वो हम आसमान में, विद्यमान तारों से कर लेंगे,

अब नज़र के लिए जब, ना बचे हैं कोई नज़ारे,
तो अब चुपके से हम, यूँ ही पलकों को मूंद लेंगे|