सुबह नयनों से पलकें जब हटी,
तो उनमें बसा अक्स तुम्हारा था|
छवि तो बस एक प्रतिबिंब थी,
माखूज़ तो अस्तित्व तुम्हारा था|
हल्की सी मुस्कान थी अद्रों पर दिन भर,
ज़हन में तस्सवूर जो तुम्हारा था|
यूँ ही चलते-चलते कैसे ना सुध-बुध खोता,
मान में उठा प्रसंग जो तुम्हारा था|
फिर छटे पहर शैय्या में निहित होते,
देखा एक सपना मैंने, आदतन तुम्हारा था|
तो उनमें बसा अक्स तुम्हारा था|
छवि तो बस एक प्रतिबिंब थी,
माखूज़ तो अस्तित्व तुम्हारा था|
हल्की सी मुस्कान थी अद्रों पर दिन भर,
ज़हन में तस्सवूर जो तुम्हारा था|
यूँ ही चलते-चलते कैसे ना सुध-बुध खोता,
मान में उठा प्रसंग जो तुम्हारा था|
फिर छटे पहर शैय्या में निहित होते,
देखा एक सपना मैंने, आदतन तुम्हारा था|