आरज़ू थी दिल में, फ़तेह करने की चोटियाँ हज़ार,
लाख कोशिशों बाद, छोड़ ना पाए ये सराय क्यूँ?
इरादा बुलंद कर दर को खोला बार-बार,
फिर भी यह काफ़िर कदम उठ ना पाए क्यूँ?
फज्र दहलीज़ फाँद कर रहगुज़र तक आ भी गये एक बार,
अब रात के अंधेरे में किधर जाएँ समझ ना आए क्यूँ?
ना करी थी हमने उससे दुआएँ, ना हुए हम कभी शुक्र-गुज़ार,
सज़ा में चाहे तो बुझा दे, ज़रा ज़रा कर तड़पाये क्यूँ?
लाख कोशिशों बाद, छोड़ ना पाए ये सराय क्यूँ?
इरादा बुलंद कर दर को खोला बार-बार,
फिर भी यह काफ़िर कदम उठ ना पाए क्यूँ?
फज्र दहलीज़ फाँद कर रहगुज़र तक आ भी गये एक बार,
अब रात के अंधेरे में किधर जाएँ समझ ना आए क्यूँ?
ना करी थी हमने उससे दुआएँ, ना हुए हम कभी शुक्र-गुज़ार,
सज़ा में चाहे तो बुझा दे, ज़रा ज़रा कर तड़पाये क्यूँ?
3 comments:
Pahle 2 paragraph ka answer hai Lazyness.. :D
nice poem... n it makes lot of sense...
but a question... why this kind of poetry as if you didn't achieved as u thought??
yeh bhagwaan he jaanta hai kis feeling se tu likhta hai...........ek ek word mein woh ras bhar deta hai ke padne wala be jajbaati ho jaata hai...........love dis :)
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