Tuesday, November 5, 2013

दशांतर

मुद्दतअों पहेले छोड़ देता दियों को, जुगनुओं की खातिर,
बलखाती लौ की मदहोशी थी, जो कोशिश करके हारा था |

यूँ तो पहले भी था रजनीकांत से व्यवहार अौर परिचय,
अब अरन में वह बना मेरा यार, मेरा सहारा था |

प्रतिवेश मैं चमक अौर नूर कि लत थी चक्षुअों को,
अब घनघोर तमस का फैला घेरा मुझे गवारा था ।

चक्रव्यूह से अाज़ादी का रास्ता नीलपंक में गढ़ा था,
मैं मूर्ख दिली अागोश के इंतज़ार मैं अरसे से खड़ा था।

छूट गया था जो पीछे, वो गाँव का उजियारा था,
वन जो विद्यमान था मेरे आगे, बसा वहाँ अंधियारा था|

नोट: अंधेरे को अच्झाई का प्रतीक अौर रोशनी को बुराई का चिन्ह दिखाने कि एक कोशिश। अौर एक तीर से दो शिकार का प्रयत्न।

1 comment:

Sidharth said...

साथ ही साथ शहर को भी बुराई का और ग्राम को अच्छाई का प्रतीक भी बना दिया। बहुत खूब