दहकते अंगरों का क्या है, गुज़रते वक़्त के साथ बुझ जाएँगे;
उठती लहरों का क्या है, साहिल पर आके टूट जाएँगी;
संग मिट्टी के तराशे पुतले हैं तो हम है;
वरना बहती हवाओं का क्या है, अंत में यह भी रुक जाएँगी;
और चोटियों पे गड़े झंडों को संकुचित कर जाएँगी|
नोट:- शीर्षिर्क गुमराह कर सकता है, आपके पास बेहतर शीर्षिर्क या और कोई सुझाव हो तो कृपया इत्तिला दे दीजिएगा| शुक्रिया|
उठती लहरों का क्या है, साहिल पर आके टूट जाएँगी;
संग मिट्टी के तराशे पुतले हैं तो हम है;
वरना बहती हवाओं का क्या है, अंत में यह भी रुक जाएँगी;
और चोटियों पे गड़े झंडों को संकुचित कर जाएँगी|
नोट:- शीर्षिर्क गुमराह कर सकता है, आपके पास बेहतर शीर्षिर्क या और कोई सुझाव हो तो कृपया इत्तिला दे दीजिएगा| शुक्रिया|
2 comments:
अंगारे 'गर दिल से हो निकले
तो वक़्त के बुझाये बुझते नही।
लहरें अगर हो भावनाओं की
तो साहिल के तोड़े टूटते नही।
मिट्टी के पुतले भी आखिर
कब तक साथ निभायेंगे।
बीते वक़्त के साथ ये नश्वर
अस्तित्वविहीन हो जायेंगे।
अगर है चाह है कि तेरे
आखिर तक रहे लहराते पताके।
तो कुछ ऐसा कर जा कि पुतले
टूटे भी तो सर उठा के।
Touché
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