Saturday, June 12, 2010

एकांत

बैठा हूँ बाग में, अकेले इस आस में,
की कोई आएगा और बैठेगा मेरे पास में.

समुद्र किनारे भी अपने आप को अकेला पाया है,
उच्छलता खेलता पानी भी दिल को ना भाया है.

आस पूरी होगी इस बात का कोई सबूत नहीं,
क्युन्कि आजकल सच का कोई वजूद नहीं.

जीतने लोग हैं, उससे दुगने मुखहोटे हैं,
देने के लिए सिक्के सबके पास खोटे हैं.

सोने की लिए गद्दा जितना मोटा है,
उतना ही ज़मीर का कद छोटा है.

जितना सबका दिल तन्हा और बेचारा है,
उतना ही वो हवनियत का मारा है.

कभी तो किसी का सच्चा साथ होगा,
उम्र भर यही इरादा दिल के पास होगा.

1 comment:

Tipsy said...

Intense man! Why oh why the melancholy theme though?