Tuesday, September 7, 2010

सागर किनारे

पिघलता चाँद टप-टप टपक रहा है सागर में,
नीले पानी में लाखों जुगनू तैर रहे हों जैसे|
अपार सागर,कोयल सी काली रात में सिर्फ़ हम दोनो खड़े हैं,
उसे मेरे लिए और मुझे उसके लिए बनाया हो जैसे|

चाँदनी उस सुंदर चेहरे को रोशन कर रही है,
कोई जुगनू उसके लिए सागर छोड़ आया हो जैसे|
ठंडी पूर्वाई केशों को मुख पर संवार रही है,
किसी परी को श्याम काजल लगाने आ रही हो जैसे|

उसके दिव्य सौंदर्ययुक्त चेहरे को देख, लालच आता है ऐसे,
कोयले की खान में, इत्तेफ़ाक़ से चमकता हीरा मिल गया हो जैसे|
कोमल अद्रों को मिलाने की चाहत है, तमन्ना है, ज़रूरत है ऐसी,
अर्सों से तट पर पड़ी नाव की नदी में फिर तैरने की ख्वाहिश होती है जैसी|

कुछ ऐसा दिखता:

3 comments:

Meenu said...

अति सुन्दर कविता लिखी है आपने ,जो हुनर आपकी सोच में हैं वह बहुत प्रभावशाली हैं,बहुत ही सुखमयी पंक्तिया हैं ,ऐसा बयान होता है जैसे इसमे जुगनू आप ही हो:):)

Tipsy said...

It's beautiful! The metaphors are so well constructed , I am tempted to believe this is more than just a poet's work! :)

Mansi said...

awwww ... its shweeet :D