Wednesday, March 7, 2012

रैना का तसव्वुर

मुद्दतें बीत गयी एकांत में चाँदनी के संग बैठे,
फिर भी क्यों भोर में घूमती भीड़ लगती है वीरानी सी?

रवि नही चिरगों के सहारे निकलते थे सीना ताने ,
ना लगी वो मंद कभी, क्यों नही लगती यह रोशनी नूरानी सी?

थे चाँद से, अकेले फिर भी थे दूर विद्यमान तारों से घिरे,
थे सदा एकाकी, फिर क्यों इस मजमे में लगती है गुमनामी सी?

मुद्दतें बीत गयी चाँद का उजाला चेहरा देखे,
फिर भी क्यों लगती है इन चेहरों पर मुस्कान अंजानी सी?

मुद्दतें बीत गयी रात का काला दामन छोड़े,
फिर भी अपनी कहते थे जिसे नही लगती कभी वो रात बेगानी सी|

 रैना   तसव्वुर

3 comments:

Sidharth said...

sahi bataaun to kuchh bhi palle nahi pada.. :D

Sidharth said...

वैसे आपकी इस दशा का कारण M.Tech. हो सकता है। :P

अचेत कुमार said...

हम M.Tech नही, MS कर रहे हैं| इस दशा की लिए कुछ हद तक उसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है, पर सच तो यह है की अगर में गुंहेगार का ढूँढना चाहता हूँ तो मुझे सिर्फ़ आईना देखने की ज़रूरत है| ग़लती किसी की भी हो पर दिल को जिसकी याद में रोना होता है उसी की याद में रोता है|