Wednesday, March 20, 2013

अधूरा फसाना

कहा था उन्होने खत एक अधूरा पड़ा है, फसाना ख़त्म करके भेज देंगे,
और वादा दिया था हमने उन्हे, उनकी दास्तान पूरी होने तक के इंतेज़ार का,
मगर वो कहानी पड़ी है कहीं एक अंश बन कर, अधूरी सी गुमनामी में,
मुमकिन है अब कली ही रहना चाहती वो, भाव खो चुकी है, इसलिए शायद|

कुछ अरसे इंतेज़ार किया उसके आखरी हर्फ का, उनके दिल के मक्तूब का,
खत खोजते थे डाक बक्से में, हर दिन, फिर हर हफ्ते, फिर हर महीने,
पर उम्मीद की स्याही ने कभी वास्तविकता के काग़ज़ पे रंग नही पकड़ा,
लिपीबद्ध सांच जो हमें करीब ला सकती थी, कलम के अंदर ही रह गयी|

अब हम दोनो काग़ज़ में क़ैद की रेखाओं के तरह रह गये हैं, आस-पास मगर बहुत दूर,
पुकार सकते है, निहार सकते है, फिर कुछ लम्हे खिल खिला सकते हैं,
फिर अगले शोक से भरे निरंतर पलों में, मन ही मन सिसकियाँ लेते हुए सोचते हैं,
की हमने नया फसाना शुरू क्यूँ नही किया, और उन्होने उनका ख़त्म क्यूँ नही,
अब हैं हम तन्हाई में अकेले खड़े, बस खड़े, वस्ल की आरज़ू लिए....|

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