तेरी आँखों की है जो जूस्तजू, उसे मैं पहचान ना सका,
देख उन्हे हुआ बेकाबू, और होश संभाल ना सका,
उज्वल पन्ने पे स्याह स्याही से लिखी है जो पहेली,
उसे चकोर जैसे ताकता रहा, पर कभी बुझा ना सका,
वाकिफ़ है श्याम पट जड़ित संगेमरमर की दीवारें,
भीतर की उलझनों में से दिल का रास्ता पा ना सका,
गुमान था तेरी फेहरिस्त-ए-तमन्नाओं में नहीं था शामिल,
शायद यादों में रह जाऊँगा, नसीब में तो ना आ सका|
देख उन्हे हुआ बेकाबू, और होश संभाल ना सका,
उज्वल पन्ने पे स्याह स्याही से लिखी है जो पहेली,
उसे चकोर जैसे ताकता रहा, पर कभी बुझा ना सका,
वाकिफ़ है श्याम पट जड़ित संगेमरमर की दीवारें,
भीतर की उलझनों में से दिल का रास्ता पा ना सका,
गुमान था तेरी फेहरिस्त-ए-तमन्नाओं में नहीं था शामिल,
शायद यादों में रह जाऊँगा, नसीब में तो ना आ सका|
2 comments:
bahut hi khoob likha hai ...i can judge the situation which forced u to write the poem ...the way u have expressed the real thought in poetry is what I liked the most !! bahut hi sahi tyareeke se pesh kiya tumne sab feelings ko.. kehne mein baat keval ek line ki thi lekin tumne puri kavita mein usay zahir kiya.. keep writing !!
अपने एम.एस की व्याख्या लिखी है क्या?
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